77 का साल. कानपुर शहर. ये वो साल था, जब कानपुर के नक्शे को नए तरीके से परिभाषित किया गया. कानपुर नगर और कानपुर देहात. पहले दोनों एक हुआ करते थे. ये वर्गीकरण होने के बाद ‘कंपू’ की राजनीति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही थी. कानपुर देहात में मंधना, शिवराजपुर, बिठूर..ये सब बड़े गढ़ बने. ये इलाके शहर से ज़्यादा दूर नहीं थे. ज़्यादातर नेताओं के लिए भी शहर में रहते हुए इन इलाकों को कंट्रोल करते रहना आसान था.

मंधना और शिवराजपुर के बीच ही एक विधानसभा सीट पड़ती थी- चौबेपुर. ब्राह्मण बहुल सीट. लेकिन 77 में चुनाव पड़े, तो यहां से जीते जनता पार्टी के हरिकिशन श्रीवास्तव. कतई ज़मीनी नेता. ठेठ मोहल्लादारी वाले. उस वक्त कानपुर में मज़दूर आंदोलन भी चल रहा था. उसमें भी हरिकिशन सक्रिय थे. यही छवि थी कि उन्होंने 80 में फिर चौबेपुर जीता. लेकिन 84 में कांग्रेस के नेकचंद्र पांडेय ने चौबेपुर के जातीय समीकरण अपने पक्ष में कर लिए और जीत हासिल की. हरिकिशन श्रीवास्तव को समझ आ चुका था कि अब जातीय समीकरण भी साथ लेकर चलना ज़रूरी है. उन्होंने 89 के चुनावों की तैयारी शुरू कर दी.

अब लौटते हैं चौबेपुर में. यहां का बिकरू गांव. यहां पास में रेडियो की दुकान पर एक लड़का बैठता था. 22-24 साल का. हट्टा-कट्ठा शरीर. गांव का दूध-घी खाया. कानपुर से डिग्री कॉलेज पढ़कर आया था, तो गांव में अलग रौला था. और लड़का बड़ा ‘हथछूट’ था. माने बात-बात पर हाथ छोड़ देता था. ब्राह्मण था. नाम- विकास दुबे.

विकास के कुछ पुराने इंटरव्यू भी सोशल मीडिया पर चलते हैं, जिसमें उसने हरिकिशन श्रीवास्तव को अपना राजनीतिक गुरु बताया है.

हरिकिशन बाबू और विकास का साथ

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार अंजनी निगम बताते हैं –

“विकास के पास थी ‘टीम’, जो हरिकिशन श्रीवास्तव के काम आ सकती थी. हरिकिशन के पास था भौकाल, जो विकास को चाहिए था. दोनों साथ आए. नतीजा- 1989 में हरिकिशन की एक और जीत और विकास की गंवई दंबगई अब गुंडई में बदलने लगी. लेकिन विकास का राजनीतिक इस्तेमाल नेकचंद्र पांडेय के समय से ही शुरू हो गया था. गांव के एक दबंग ब्राह्मण लड़के का पहली बार राजनीतिक लाभ उन्होंने ही लिया. चुनाव भी जीता. हालांकि इसके बाद विकास, हरिकिशन बाबू का शागिर्द हो गया. विकास भी उन्हें बाबूजी ही कहता था. और जब ये विकास पंडित जी के नाम से जाना जाने लगा, तब भी वो हरिकिशन को अपना राजनीतिक गुरु बताता था.”

मटर का दाना बना पहले मर्डर की वजह

कानपुर में ‘दैनिक जागरण’ अख़बार के पत्रकार सरस बाजपेयी शहर में 1990 के अल्ले-पल्ले से क्राइम रिपोर्टिंग कर रहे हैं. वो विकास के पहले बड़े केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं-

“गांवों में लोगों के खेत-बगीचे अक्सर एक-दूसरे से सटे हुए रहते हैं. 1990-91 के वक्त की बात कर रहे हैं, तो उस वक्त तो ज़्यादा कोई बाड़बंदी भी नहीं रहती थी खेतों के बीच में. एफआईआर में क्या रहा-क्या नहीं, वो तो अलग बात है. लेकिन उस वक्त जो बात पता चली थी, वो ये थी कि विकास के पिता रामकुमार एक रोज अपने खेत की मेड़ पर बैठे थे. जाने-अनजाने में बगल खेत से मटर तोड़-तोड़कर खाने लगे. ये खेत था एक दलित का. वो आया और विकास के पिता को बहुत कुछ बोला. ये बात पता लगी विकास दुबे को. यहीं से इज्ज़त और ज़मीन का झगड़ा शुरू हुआ, जिसमें उस खेत मालिक का मर्डर हो गया. आरोप आया विकास दुबे पर. पहला बड़ा आरोप. मर्डर का.”

यहां से विकास का रसूख़, राजनीतिक पकड़ और गुंडई बढ़ती चली गई.

विकास की पर्ची पर मिलती थी नौकरी

अंजनी निगम बताते हैं –

“विकास के पास हमेशा से अच्छी टीम रही. उसने इलाके के लड़कों को अपने साथ जोड़ा, उनकी मदद की और ये लड़के विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे.”

लेकिन विकास की ये टीम बनी कहां से? वो बताते हैं-

“हरिकिशन बाबू के नाम का विकास जमकर इस्तेमाल करता था. चूंकि वो हरिकिशन के काम भी आता था, तो वे आपत्ति भी नहीं करते थे. इसी तरह बढ़ते हुए विकास ने एक बड़ी डिटर्जेंट फैक्ट्री का मालिकों तक अपनी जबरदस्त पैठ बना ली. चौबेपुर में ये फैक्ट्री थी, जहां विकास दुबे की लिखी पर्ची पर नौकरी मिल जाती थी. न सिर्फ नौकरी दिलाता था, बल्कि तनख्वाह भी ख़ुद ही तय करता था. चौबेपुर, शिवली, बिठूर के आस-पास के 20-25 गांवों के 400 से 500 लड़कों की विकास ने नौकरी लगवाई. विकास ने जान-पहचान के दम पर गांव में तमाम काम करवा दिए, जैसे हैंडपंप, लाइट, सड़क. यहां से गांव में विकास का रुतबा बढ़ गया.”

खुल्लर का साथ और विकास की कानपुर शहर में एंट्री

1997-98 के आस-पास कानपुर शहर के काकादेव, शास्त्री नगर इलाकों में दो नाम चलते थे- राजू खुल्लर और भूरे. खुल्लर और भूरे में भयंकर तनातनी थी. अब तक विकास दुबे की पकड़ गांवों तक ही थी. लेकिन इसी बीच उसकी मुलाकात हुई खुल्लर से. विकास और खुल्लर की बनने लगी. विकास के आने से खुल्लर का पलड़ा भी भारी हुआ. नतीजा- भूरे को शास्त्री नगर इलाका छोड़कर जाना पड़ा.

अब देहात में विकास का कोई मैटर हो, तो खुल्लर टीम लेकर पहुंचता. शहर में खुल्लर को ज़रूरत हो, तो विकास लड़के लेकर आता. विकास की कानपुर सिटी में ऑफिशल एंट्री हुई.

इसी बीच खुल्लर की बहन ऋचा से विकास के प्रेम संबंध हुए और आगे चलकर दोनों ने शादी भी की.

पैसे और राजनीतिक संरक्षण के दम पर विकास की पहुंच काफी बढ़ चुकी थी. साथ में उसका करीबी अमर दुबे.

जब दो नेता विकास के लिए धरने पर बैठे

सरस बाजपेयी बताते हैं-

“कल्याणपुर में एक दारोगा हुए थे- हरिओम यादव. हरिओम यादव विकास दुबे को तड़े थे. एक रोज़ विकास शिवली से कानपुर कचहरी आया था. लौटते वक्त हरिओम ने विकास को पकड़ लिया. पुलिस और विकास के गुंडों में बहुत लड़ाई हुई. कहते हैं कि हरिओम यादव ने गोली तक चलाई. आखिर पुलिस ने विकास को धर लिया और लेकर चली कल्याणपुर थाने. जब तक पुलिस विकास को लेकर थाने पहुंचती, तब तक शिवली, चौबेपुर से ट्रैक्टरों में भरकर 500 से ज़्यादा लोग थाने पहुंच चुके थे. गांव के लोगों को डर था कि पुलिस ‘विकास भइया’ को मार देगी. जो भी कार्रवाई हो, वो सबके सामने हो, इस मांग को लेकर शहर के दो नेता धरने पर भी बैठ गए थे. भगवती सागर और राजाराम पाल.”

भगवती सागर इस समय बिल्हौर विधानसभा सीट से विधायक हैं. राजाराम पाल अकबरपुर सीट से सांसद रह चुके.

विकास के कहने पर एक कंपनी को मिलने लगा 20-25 गांवों का दूध

एक किस्सा कानपुर में बहुत चलता है. जिस डिटर्जेंट कंपनी में विकास की पर्ची पर नौकरी मिलती थी, वही कंपनी लॉन्च कर रही थी एक दूध-डेरी ब्रांड. बात है 2005-2007 के भी बाद की. तब तक विकास का रसूख़ काफी बढ़ चुका था. कंपनी को बाज़ार में पैर जमाने थे. विकास से मदद मांगी गई. विकास ने शिवली, चौबेपुर, बिठूर के आस-पास के करीब 20-25 गांवों को कह दिया कि आज से सारा दूध इस एक कंपनी को ही जाएगा. सारे गांवों का दूध उस एक कंपनी को ही जाने लगा. कंपनी धड़ाधड़ चल निकली. कंपनी को फायदा हुआ कि उन्हें इफरात में दूध मिलने लगा. गांव के दूध बेचने वालों को फायदा हुआ कि उनका दूध हाथ के हाथ बिकने लगा. और बड़ा फायदा हुआ विकास को, क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता कि विकास ने इतना बड़ा काम भलमनसाहत में कर दिया हो. यहां से कमीशन के तौर पर विकास ने जमकर पैसा बनाया.

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