सच कहूं तो लगा कि भाई को जवाब लिख दूं. पूछूं कि इतना क्यों कल्ला रहा है भाई आपको. किस बंगाली लड़की ने आपके प्रेम को अस्वीकार कर दिया क्या. लेकिन किसी से उलझने से बेहतर है लोगों से बातें करना. ये समझना कि बंगाली लड़कियों को लेकर इतने स्टीरियोटाइप क्यों हैं.

यहां एक और सवाल पूछना ज़रूरी है. क्या सिर्फ बंगाली लड़कियों या बंगालियों को लेकर स्टीरियोटाइप हैं?

स्टीरियोटाइप सिर्फ एक ख़ास समुदाय को लेकर नहीं हैं. सबको लेकर हैं . (फिल्म बुलबुल से एक सीन. सीन में एक्ट्रेस तृप्ति डिमरी दिख रही हैं.

एक नज़र डालते हैं हमारे पॉपुलर कल्चर पर. अपनी फिल्मों या टीवी सीरियल्स को देखकर हमें क्या पता चलता है? ये कि पंजाब में सब या तो ड्रग्स करते हैं या लस्सी पीते हैं. हरियाणा में सब कुश्ती लड़ते हैं. राजस्थान में सब रजवाड़े होते हैं और खूब गहने पहनकर महलों में रहते हैं. यूपी और बिहार में लोग सिर्फ देसी कट्टे रखते हैं और क्राइम करते हैं. और बंगाली जादू टोना करते हैं. अखबार के पन्नों आपने भी बाबा बंगाली के इश्तेहार देखे होंगे. जो लोगों को वशीकरण मंत्र बांटते फिरते हैं. हममें से कितने लोगों ने इस बाबा से मिलकर जाना है कि वो बंगाली है या नहीं? मालूम नहीं. सिर्फ बंगाली ही नहीं, किसी भी राज्य के लोगों को दिखाने के लिए उस स्टेट या उस भाषाई समूह की कुछ बातें हाइलाइट कर दी जाती हैं. और वो बाकी भाषाओं के समुदायों या राज्यों के लोगों के लिए उस जगह की पहचान बन जाती है.

यूपी-बिहार के लिए भी कई स्टीरियोटाइप बने हुए हैं. (फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर से एक सीन)

हमारी बात हुई दीपिका से. वो एक नॉन-बंगाली होते हुए एक बंगाली एरिया में बड़ी हुई हैं. वो बताती हैं:

 

इसी क्रम में बंगाल की लड़कियों को भी स्टीरियोटाइप में ढाला जाता है. एक भंसाली की पारो हुई थी जो हर बात पर इश-इश करती रहती थी. एक परिणीता फिल्म की ललिता हुई थी. गौर से देखें तो बंगाली ब्याहता की एक छवि तमाम पॉपुलर रेफरेंसेज के बाद हम अपने मन में बनाते हैं. बड़ी काजल भरी आंखें, संगीत की ट्रेनिंग, हाथ और पांव में महावर, बंगाली तरीके से बंधी साड़ी और न जाने क्या-क्या. कुछ समय पहले आए बादशाह के गाने ‘गेंदा फूल’ का वीडियो तो याद ही होगा. न याद हो तो गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की दुर्गा याद होगी. जिसे सिर्फ बंगालन के नाम से याद रखा गया. जो हमेशा उसके जीवन में एक अन्य स्त्री की तरह रही. उसकी पहली पत्नी की तरह कभी मुख्य स्त्री नहीं बन पाई.

फिल्म ‘परिणीता’ में विद्या बालन ने एक बंगाली महिला का किरदार निभाया था. उसके बाद फिल्म ‘भूल-भुलैया’ में वो मंजुलिका के किरदार में दिखाई दी थी.

चूंकि बंगाली लड़कियों का रिप्रेजेंटेशन कई बार कामुक होता है. कामुकता के साथ डर भी आता है. अगर लड़की अपनी कामुकता ज़ाहिर करती है तो समाज उससे डरता है. फिर उससे जुड़े तमाम झूठ जैसे वो पुरुष को तबाह कर देगी, अपने सौन्दर्य से उसे बेबस कर देगी. ये नैरेटिव में आने लगते हैं. चाहे वो ‘बुलबुल’ फिल्म की चुड़ैल, ‘स्त्री’ की स्त्री या ‘राज़’ फिल्म की भूतनी. या फिर ‘भूल भुलैया’ की क्लासिक मंजुलिका. बेहद आकर्षक होना उसकी पहली शर्त होती है. चूंकि बंगाली लड़कियों का चित्रण आकर्षक है, ये मानना कि वो धोखा देंगी, भी आसान हो जाता है.

बंगाली महिलाओं का चित्रण भी वैसा ही होता है, कि उन्हें कामुकता से जोड़ कर देखा जाता है. तस्वीर में बिपाशा बसु.

तो क्या हम ये कह रहे हैं पूरी दुनिया बेकार है और बंगाली सबसे अच्छे? नहीं. बिलकुल नहीं. हम सिर्फ ये कह रहे हैं कि कोई इंसान कैसा है, उसका चरित्र कैसा है, ये उसके राज्य या उसकी भाषा से तय नहीं किया जा सकता.

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