Rendezvous With Imran Khan. Engagé en politique depuis 1996, élu député en 2002, l'ancien champion du monde de cricket, Imran KHAN, brigue le poste de Premier ministre du Pakistan. Ici, attitude d'Imran KHAN, vêtu du traditionnel 'salwar kameez', posant dans sa villa située sur les hauteurs d'Islamabad. Mars 2012. (Photo by Alvaro Canovas/Paris Match via Getty Images)

25 जुलाई, 2018 को पाकिस्तान में चुनाव हुए. पाकिस्तान में लोकतंत्र का पस्त रेकॉर्ड रहा है. ऐसे में यहां कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले, तो बड़ी बात है. ये पहली बार हुआ कि पाकिस्तान में बैक-टू-बैक दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया. ये जो हुआ है, वो ऐतिहासिक है. इस खास मौके पर द लल्लनटॉप पाकिस्तान की राजनीति पर एक सीरीज़ लाया है. शुरुआत से लेकर अब तक. पढ़िए, इस सीरीज़ की 15वीं किस्त.


ये उन दिनों की बात है, जब नवाज शरीफ पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. 1991 का साल था. आसिफ नवाज जानुजा आर्मी चीफ थे. आर्मी के सपोर्ट की वजह से नवाज यहां तक पहुंच पाए थे. मगर फिर PM बनकर नवाज को लगने लगा कि उन्हें सेना की जरूरत नहीं. कि अब वो अपनी बदौलत भीड़ को खींचने का माद्दा रखते हैं. ये सोचना था कि नवाज खुद की राह चलने में जुट गए. मगर नवाज सेना से सीधे-सीधे बिगाड़ना नहीं चाहते थे. जीतने के कई तरीके होते हैं. या तो किसी को हरा दो. या उसे खरीद लो. तो नवाज ने अपना सिग्ननेचर दांव आजमाया.

एक दिन की बात है. मरी में एक मीटिंग थी. आर्मी चीफ जानुजा भी आए थे. मीटिंग के बाद जानुजा जाने लगे. नवाज उन्हें छोड़ने साथ आए. फिर एकाएक उन्होंने आर्मी चीफ से पूछा- आपके पास कौन सी कार है? जानुजा ने कहा- टॉयटा क्राउन. इस पर शरीफ ने बड़ी खुशामद के अंदाज में जवाब दिया- ये कार आपके लायक नहीं है. फिर उन्होंने साथ के एक आदमी की तरफ इशारा किया. वो आदमी दौड़ा गया एक ओर. आया, तो उसके साथ एक ब्रैंड न्यू चमचमाती बीएमडब्ल्यू थी. नवाज ने उस कार की चाभी जानुजा को थमाई. फिर बोले, आप पर तो यही कार जंचेगी. जानुजा को काटो तो खून नहीं. वो सोच रहे थे. नवाज की इतनी हिम्मत की इतनी ढीठाई से सबके सामने रिश्वत ऑफर करें! खरीदने की कोशिश करें! मगर जानुजा ने खुद पर काबू रखा. चाभी लौटाते हुए बोले- बहुत शुक्रिया आपका. लेकिन मेरे पास जो है, मैं उसी में खुश हूं.

विरोधी हों कि पत्रकार, या कि विधायक-नेता, सबको सेटल करने के लिए नवाज का एक बड़ा कारगर फॉर्म्युला था. पैसे लुटाओ, महंगे तोहफे दो. ये नवाज का अंदाज था. कहते हैं, जैसे वो खुद पैसों की भाषा समझते थे. वैसे ही वो दूसरों को भी पैसों की भाषा से ही समझाने की कोशिश करते थे. जैसे धूप के साथ पसीना, प्रेमी के साथ प्रेमिका और कोयले के साथ धुआं जुड़ता है. कहते हैं कि नवाज और करप्शन के बीच भी बिल्कुल वैसा ही रिश्ता है. नवाज कोई नजूमी होते, तो तौबा करते. क्योंकि उन्हें चल जाता कि भ्रष्ट होने का ये रेपुटेशन आगे चलकर उन्हें बर्बाद करने वाला है.

विरोधी कहते हैं कि नवाज की पॉलिटिक्स ‘खाने और खिलाने’ पर टिकी थी. खाने से मतलब खुद का फायदा. खिलाने का मतलब, पैसा-जमीन या तोहफे देकर दूसरों को चुप करवाना. इसी से जुड़ा एक टर्म है लिफाफा जर्नलिज्म. कहते हैं नवाज पत्रकारों को रिश्वत देते थे. ताकि वो उनके करप्शन के मामले रिपोर्ट न करें (फोटो: Getty)

पहली बार जैसा न हो, ये सोचकर नवाज ने कई गलतियां की
बतौर PM नवाज के पहले कार्यकाल में ही उनके और सेना के बीच फासले आ गए थे. इस वजह से नवाज में शुरू से एक किस्म की असुरक्षा थी. वो सेना और ISI की दखलंदाजी पर, उनके कंट्रोल करने की आदत पर काबू पाना चाहते थे. पहले मिर्जा असलम बेग. फिर जनरल जानुजा. नवाज की इन दोनों सेना प्रमुखों से नहीं पटी. फिर जानुजा की मौत हो गई. 1993 में नवाज वहीद काकर को आर्मी चीफ बनाकर ले आए. मगर जब नवाज का राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने साथ पंगा हुआ, तो उन्हें आर्मी चीफ से कोई सपोर्ट नहीं मिला. बल्कि सुप्रीम कोर्ट से अपने हक में फैसला लेकर नवाज को फिर आर्मी ने ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. 1997 में जब नवाज दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तब ये सारा अतीत उनके दिमाग में था. उन्होंने बहुत सोच-समझकर परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया. नवाज को लगा था कि परवेज वफादार निकलेंगे. अपने से पहले वालों की तरह नवाज ने भी गलती की थी. मुशर्रफ ने न केवल उन्हें कारगिल दिया, बल्कि उनकी गद्दी भी छीन ली. मगर उस सब तक पहुंचने से पहले कुछ बातें, जो नवाज के इस दूसरे कार्यकाल का हाई पॉइंट साबित हुईं.

तालिबान सरकार को मान्यता
1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार बना ली. उनसे पहले वहां मुजाहिदीन सरकार थी. राष्ट्रपति थे, बुरहानुद्दीन रब्बानी. रब्बानी 1992 से 1996 तक अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे थे. सितंबर 1996 में उन्हें हटाकर तालिबान ने वहां ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ बनाया. फरवरी 1997 में नवाज PM बने. और मई 1997 में पाकिस्तान ने तालिबान सरकार को मान्यता दे दी.

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